सिया

सिया
म्हारे हिवड़े रो खुणु ...

Tuesday, March 17, 2015

"थार- सप्तक" किताब में स्यूं दोय कवितावां !!!





गळती आपणी !

आ सरासर
गळती आपणी...
के लोग ढूंढे खोट

गळती आपणी के
लोग बणावे बातां
जद देखे है हेत
आपणे नैणा में...

गळती है आपणी
क एक दूजा ने
देख’र जीवां हां...

आ ही तो है
गलती आपणी
के मिलग्या ऐ
मन सु मन
अ’र देख लिया
साथ रा सुपणा...


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हेत !

अरे हेत
थूं आयग्यो कांई
कठे रेयो इतरा दिन ?

कुण रे सुपना रा
चादरा बणाया
कुण री थूं नींद उड़ाई
कुणसी गोरड़ी रो
रूप करयो चोरी ?

अब थूं
म्हारे खन्ने
कांई लेबा ने आयो है ?

म्हारो बो मन तो
कोई लेयग्यो
अ’र इस्यो बरत्यो
के करदी
तरेड़ां ही तरेड़ां

अबे थन्ने
म्हें राखूं कठे ?


-सिया चौधरी

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http://dingalpingal.blogspot.in/2011/12/siya-choudhary.html

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