सिया

सिया
म्हारे हिवड़े रो खुणु ...

Tuesday, March 17, 2015

"मंडाण"(युवा कवियां री नवी कवितावां) किताब स्यूं दोय कवितावां !!!






थारै ई पाण...!


थारै ई पाण,
लगा लिया पांखड़ा
ऊभगी मेड़ी पर, पण
क्यूं डरपै है काळजो
उडण रै नांव सूं....!

थारै ई पाण,
कर लियो सिणगार
बैठगी डोली में, पण
क्यूं घबरावै है जीव
उण अणसैंधा गांव सूं....!

थारै ई पाण,
बांध लियो भरोसो
चाल पड़ी लारै, पण
क्यूं रुक-झुक खरूंचूं
आस री जमीं पांव सूं...!



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ओळूं आई...!

मां रै सागै थांरी
करती ही हथाई
फेर आ जावती लाज
जद मां बतावती
सासरियै री कोई बात....।

म्हनैं पाछी
मधरै वायरै-सी
ओळूं आई...

बैनां चिड़ावती,
हंसती अर कैवती-
ओ लाडेसर जीजी!
थांरो ब्यांव करांला
कैर रै उपराळै बैठा....।

फेर कठै सूं
थाक्योड़ी-सी म्हनैं
ओळूं आई....

बिना खोट, क्यूं थे
भेज दियो संदेसो
कै नीं आवैली
म्हारै मांढै ऊपरां
थांरी बरात....।

-सिया चौधरी 

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Note: कविता कोश का लिंक

http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80

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